Saturday, 3 October 2015

विध्वा

जो वह चाहती है 
वही वह कहती है 
फिर क्यों उसकी रंग-बिरंगी ज़िन्दगी 
रेगज़ार सी हो जाती है 
हर विध्वा कुछ कहती है - 2 x

उसका क्या दोष है 
क्यों उसकी ज़िन्दग़ी बंज़र बन जाती है  
मौसम बसंत का है 
फिर क्यों वह पतझड़ में रहती है
हर विध्वा कुछ कहती है - 2 x

था उसका कभी हर जगह से नाता 
फिर क्यों आज वह चार दीवारो में रहती है 
क्यों कहीं वह जा नहीं सकती 
क्यों वह बन्दिशों में रहती है 
हर विध्वा कुछ कहती है - 2 x

आया मौसम सावन मिलन का 
हर औरत कहती है 
फिर क्यों वह ही किवाड़ के पीछे रहती है 
थी बेपरवा कभी उसकी भी ज़िन्दगी  
फिर क्यों आज वह बंधन में रहती है 
हर विध्वा कुछ कहती है - 2 x

लपेट दिया है उसे सफेद चादर में 
जो मुर्दो को पहनाई जाती है 
अब न उसके चेहरे में श्रृंगार है 
न हाथो में चूड़िया रहती है 
हर विध्वा कुछ कहती है - 2 x


Sunday, 12 July 2015

तेरे नाल

मैं ता ज़िन्दड़ी... बीताणिया...

तेरे नाल  तेरे नाल 
तेरे नाल  तेरे नाल सोणेया
आज  मैं तेरे नाल 
कल किथे खो जांणिया 

सानु ता भरोसा है खुद पे 
ज़िन्दड़ी दा की भरोसा सोणेया
कदे ढुल जाए ए साह
कदे छड के तूर जाए सोणेया 
तेरे नाल  तेरे नाल 
तेरे नाल  तेरे नाल सोणेया

आज  मैं तेरे नाल 
कल किथे खो जांणिया
सानु ता डर नहीं मौत दा 
नहीं फिकरा ज़माने दी सोणेया 
डर लगदा है मैनु 
तेरे प्यार वेख के सोणेया 
तेरे नाल  तेरे नाल 
तेरे नाल  तेरे नाल सोणेया

आज  मैं तेरे नाल 
कल किथे खो जांणिया
आज मैं तेरे नाल ऑ 
तू मेरे नाल ऑ सोणेया 
की होगा जद तू आएगा 
जे मैं तब तक न रही सोणेया 
तेरे नाल  तेरे नाल 
तेरे नाल  तेरे नाल सोणेया
आज  मैं तेरे नाल 
कल किथे खो जांणिया

तेनु न दस्या मैं अपणा दर्द 
तेरे लइ चुप रही सोणेया 
जे तेनु पता लग जाए 
तू छड के न जाएगा मैनु सोणेया
तेरे नाल  तेरे नाल 
तेरे नाल  तेरे नाल सोणेया
आज  मैं तेरे नाल 
कल किथे खो जांणिया

जा मैनु छड के किथे दूर 
अपणी जिंदड़ी जी ले सोणेया
बड़ तू ज़िन्दगी च आग़े 
कदे मुड़ के वी वेखि न सोणेया
तेरे नाल  तेरे नाल 
तेरे नाल  तेरे नाल सोणेया
आज  मैं तेरे नाल 
कल किथे खो जांणिया


Monday, 20 April 2015

रोटी

मंज़िल है रोटी 
ज़िन्दगी भी रोटी
हम क्या सोचे जग के लिए 
जब पेट में ना हो रोटी 
है ये दुनिया बहुत बड़ी 
हमारी दुनिया है बहुत छोटी 
मंज़िल है रोटी 
ज़िन्दगी भी रोटी 

जी रहे है हम ज़िन्दगी 
बस,जैसे एक झोंपड़ी टूटी-फूटी 
न चाहे हम कुछ भी 
बस,चाहे हम दो वक़्त की रोटी
मंज़िल है रोटी 
ज़िन्दगी भी  रोटी 

मुश्किल से होता है हमारा गुज़ारा 
न हमने किसी से है मांगा 
न खुदा के सिवा किसी को पुकारा 
है अगर हमें उस खुदा ने बनाया 
फिर कैसे देख रहा है वो ये नज़ारा 
मंज़िल है रोटी 
ज़िन्दगी भी  रोटी 

किसी की न हो ऐसी ज़िन्दगी 
करते है हम दुआ 
भुला देंगे हम भी वक़्त के साथ-साथ 
जो हमारे साथ हुआ 
मिले चाहे एक वक़्त की रोटी 
खॉंएगे मिल बाँट के रूखी सुखी 
मंज़िल है रोटी 
ज़िन्दगी भी  रोटी 

समय-समय पर नहीं मिलती है रोज़ी 
फिर कैसे खॉंए हम रोटी 
घर में है एक छोटी बेटी 
सो जाती है जो 
भूख से रोती-रोती 
मंज़िल है रोटी 
ज़िन्दगी भी  रोटी


Friday, 10 April 2015

हाय रबा

मैं तेरे इक हंजू दे बराबर  
साडी ज़िन्दगी दा मोल लगा बैठा  
मैं समझा ओ कमली मेरे प्यार च  
ऐ गलती साडी ज़िन्दगी च कर बैठा    
हाय रबा… हाय रबा…
ऐ प्यार मैं कैसे कर बैठा  
हाय रबा… हाय रबा…


तुर गई ओ मेनू छड के  
बीच राह च साथ छड दिया  
कि करिये साढ़े पाघ ओखे ने  
हुन ता मैं सब कुछ खो बैठा 
हाय रबा… हाय रबा…
ऐ प्यार मैं कैसे कर बैठा  
हाय रबा… हाय रबा…  


हुन ता आस वी मुक गई  
इक आस है बस खुदा  
सोच्या नहीं था कदे  
ज़िन्दगी च ऐदा होंगे जुदा  
हाय रबा… हाय रबा…
ऐ प्यार मैं कैसे कर बैठा  
हाय रबा… हाय रबा…


साडी चाहत सी तू  
चाहा था तुझे  
तेरे सिवा साडी ज़िंदगी च   
नहीं था कोई दूजा  
हाय रबा… हाय रबा…
ऐ प्यार मैं कैसे कर बैठा 
हाय रबा… हाय रबा…   

Sunday, 5 April 2015

कैसी तलाश

all about destination, goal...