बेवजह गम क्यों
देता है कोई
आँख हुई नम
तो क्या करेगा कोई
उजाड़ के चला गया
वह बसन्त बस्ती को
बच्चे माँ के बिना
माँ बच्चों के बिना हो गई
देखनी थी जिन नन्ही
आँखों को ये दुनियाँ
वक्त से पहले
क्यों वह सो गई
चलना था जिसको
अभी आगे बहुत
अब अपंग हो गई
भीड़ में रहते भी
क्यों वह तन्हा हो गई
क्या हर तरफ दहशत
का मंजर चाहिए इनको
कैसी ये मानवता हो गई
लड़ने वालों का पता नहीं
ये कैसी शरेआम जंग हो गई
क्यों आदमी को
आदमी खटकता है
क्यों नाराज़ हो गया है कोई
कब तक होते रहेंगे ये दंगें
क्या इंसाफ करेगा कोई
बड़े -बड़े नेताओं की
बड़ी -बड़ी बातें हो गई
कहते हैं कार्यवाही सख्त होगी
पर बरबाद तो
हो गया है कोई
देता है कोई
आँख हुई नम
तो क्या करेगा कोई
उजाड़ के चला गया
वह बसन्त बस्ती को
बच्चे माँ के बिना
माँ बच्चों के बिना हो गई
देखनी थी जिन नन्ही
आँखों को ये दुनियाँ
वक्त से पहले
क्यों वह सो गई
चलना था जिसको
अभी आगे बहुत
अब अपंग हो गई
भीड़ में रहते भी
क्यों वह तन्हा हो गई
क्या हर तरफ दहशत
का मंजर चाहिए इनको
कैसी ये मानवता हो गई
लड़ने वालों का पता नहीं
ये कैसी शरेआम जंग हो गई
क्यों आदमी को
आदमी खटकता है
क्यों नाराज़ हो गया है कोई
कब तक होते रहेंगे ये दंगें
क्या इंसाफ करेगा कोई
बड़े -बड़े नेताओं की
बड़ी -बड़ी बातें हो गई
कहते हैं कार्यवाही सख्त होगी
पर बरबाद तो
हो गया है कोई