Thursday, 5 January 2017

दंगों का दर्द

बेवजह गम क्यों   
देता है कोई 
आँख हुई नम
तो क्या करेगा कोई 

उजाड़ के चला गया 
वह बसन्त बस्ती को 
बच्चे माँ के बिना 
माँ बच्चों के बिना हो गई 

देखनी थी जिन नन्ही 
आँखों को ये दुनियाँ 
वक्त से पहले 
क्यों वह सो गई 

चलना था जिसको 
अभी आगे बहुत 
अब अपंग हो गई 
भीड़ में रहते भी 
क्यों वह तन्हा हो गई 

क्या हर तरफ दहशत 
का मंजर चाहिए इनको 
कैसी ये मानवता हो गई 
लड़ने वालों का पता नहीं 
ये कैसी शरेआम जंग हो गई 

क्यों आदमी को 
आदमी खटकता है 
क्यों नाराज़ हो गया है कोई 
कब तक होते रहेंगे ये दंगें 
क्या इंसाफ करेगा कोई 

बड़े -बड़े नेताओं की 
बड़ी -बड़ी बातें हो गई 
कहते हैं कार्यवाही सख्त होगी 
पर बरबाद तो 
हो गया है कोई