Monday, 20 April 2015

रोटी

मंज़िल है रोटी 
ज़िन्दगी भी रोटी
हम क्या सोचे जग के लिए 
जब पेट में ना हो रोटी 
है ये दुनिया बहुत बड़ी 
हमारी दुनिया है बहुत छोटी 
मंज़िल है रोटी 
ज़िन्दगी भी रोटी 

जी रहे है हम ज़िन्दगी 
बस,जैसे एक झोंपड़ी टूटी-फूटी 
न चाहे हम कुछ भी 
बस,चाहे हम दो वक़्त की रोटी
मंज़िल है रोटी 
ज़िन्दगी भी  रोटी 

मुश्किल से होता है हमारा गुज़ारा 
न हमने किसी से है मांगा 
न खुदा के सिवा किसी को पुकारा 
है अगर हमें उस खुदा ने बनाया 
फिर कैसे देख रहा है वो ये नज़ारा 
मंज़िल है रोटी 
ज़िन्दगी भी  रोटी 

किसी की न हो ऐसी ज़िन्दगी 
करते है हम दुआ 
भुला देंगे हम भी वक़्त के साथ-साथ 
जो हमारे साथ हुआ 
मिले चाहे एक वक़्त की रोटी 
खॉंएगे मिल बाँट के रूखी सुखी 
मंज़िल है रोटी 
ज़िन्दगी भी  रोटी 

समय-समय पर नहीं मिलती है रोज़ी 
फिर कैसे खॉंए हम रोटी 
घर में है एक छोटी बेटी 
सो जाती है जो 
भूख से रोती-रोती 
मंज़िल है रोटी 
ज़िन्दगी भी  रोटी


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