Saturday, 18 March 2017

ललकार

जन्म से नहीं
कर्म से जात बनाओ
ओ धर्म के ठेकेदारों
अब तो समझ जाओ

कब तक बांटते रहोगे  
तुम इस देश को
कभी धर्म के नाम पर
कभी जात के नाम पर

कब तुम छोड़ेंगे
कटरवाद की धारणा को
क्या कभी जीने देंगें
तुम यहाँ इंसानों को

कब बंद करेंगे तुम
जनता के पैसों से
चलने वाली दुकानों को 
जीवन का समय है चार दिन
कब तक भरोगे खज़ानों को

कब तक धर्म परिवर्तन होता रहेगा
मानव अपने वजुद के लिए
क्या यूँ ही लड़ता रहेगा
क्या कभी कोई बोलेगा नहीं 
कब तक चलेगा ऐसा 
कब तक ये सब झेलता रहेगा 


Saturday, 4 March 2017

कैदी का घर

सामने दिखती हैं सलाखें 
खामोश है हर दीवार
तन्हाई करती हैं बातें
जब मैं जागता हूँ 
पाता हूँ दीवारों का घेरा
कोई नहीं जानता यहाँ मुझे 
एक नम्बर है अब नाम मेरा

एक अजब सी तन्हाई है इसमें
बैठा रहता हूँ तन्हा जिसमें
कहा एक शख्स ने
कल तक था यहाँ कोई और
अब है ये तेरा
न है इसमें किसी का आन-जाना
न है साथ में किसी का बसेरा

है यहाँ पीने के पानी का घड़ा 
वो रहता है कोने में पड़ा-पड़ा
सोने को है लोहे की खाट
उसमें बिछी रहती है एक टाट
आता है जब यहाँ खाना
होता है तब एक दिये से सवेरा
बाकी रहता है हर पल अँधेरा

कभी बैठ कर कभी सो कर
है मैंने यहाँ दिन गुज़ारा
मालूम नहीं पड़ता कब शाम
कब होता है सवेरा
देखता हूँ जब बहार को
पाता हूँ दो आदमियों का 
है मुझ पे पहरा