Saturday, 26 January 2019

विकलाँग की दास्ता

शरीर से विकलाँग हूँ
दिमाग से नहीं
शरीर से विकलाँग हूँ
सोच से नहीं
मुझे साथ ले कर क्यों
नहीं चलता है ज़माना
दिखावे के लिए सब
दिखते है मुझसे सहानुभूती
मेरी पीट के पीछे कुछ
और बातें करता है ज़माना

मैं भी कुछ ऐसा करुँगा
कि दुनिया में अपना नाम करुँगा
न किसी के आगे
हाथ फ़ैलाने पड़े
इतना सशक्त मैं खुद को बनाउँगा

है हिम्मत है होंसला
मंज़िल पा के मैं भी दिखाउँगा
हम किसी से कम नहीं
ये दुनिया को मैं बताऊंगा

क्यों देखते हो तुम हमें
घृणा की द्रिष्टी से
सोचो कैसी होगी ज़िन्दगी
अगर तुम कभी ऐसे जन्में
सिर्फ सोच के देखो
कैसी होगी ज़िन्दगी
सोचा है क्या कभी
कैसी ज़िन्दगी गुज़ारी हमने

तय कर लिया अब हमने
चलेंगे हम तुम्हारे संग में
तुम हमें साथ ले चलो
या न ले के चलो
हम भी कूद गए हैं
देश को आगे ले जाने की जंग में


Tuesday, 15 January 2019

चिड़िया रानी

बड़ी दर्द भरी है तेरी दास्ता
ओ चिड़िया रानी
मैं भी तो लिखु कुछ तेरे लिए
लोगों ने लिख दी कई कहानी

कैसे समझेगी ये ज़ालिम दुनियाँ
उसके कर्मो से होती है मुझे परेशानी
कौन रोकेगा कैसे रोकेगा उन्हें
वह तो करते है मन-मानी

दुनियाँ तो सम्भली नहीं
ब्रह्माण्ड की बात करके बनते है विज्ञानी
पढ़े-लिखें तो सब बनते है
दूसरों के लिए सोचने वाला कोई नहीं

हवा तो दुषित कर ही दी है
न छोड़ रहे है अब पानी
खाने पिने की तो मुश्किल है ही
रहने का भी कोई, कहीं ठिकाना नहीं

हर मुश्किल में जी लेती
हर गम भी सह लेती
पर वक़्त जब आता है घर बसाने का
तब कहीं एक तिनका भी मिलता नहीं

तेरे घर की वजह से आज
मेरा घर कहीं बस्ता नहीं
खतरे में है मेरा वजुद आज
क्यों किसी को मेरी चिन्ता ही नहीं

माना प्रकृति मेरी नहीं
पर इसमें तेरा भी तो अधिकार नहीं
फिर क्यों तू मनमानी करता है
एक दिन तेरा भी तो वजूद बचेगा नहीं