Wednesday, 28 April 2021

उसके कश

हवा में धुँआ वह उड़ाता था
अपने मस्लस देख कर
कश वह लगाता था

कश अन्दर
वह अपने मसल्स देखता था
कश बाहर
वह आसमान को देखता था

नौसिखिया था शायद वह
अभी-अभी पीना सीखा था
थोड़ा काश अन्दर
फिर हवा में उड़ा देता था

फटा-फट कश  खिंचता था
आँखों को वह मिचता था
ऐश गिराना भी नहीं
आता था उसे
फिर भी धुँआ उड़ाता था

कभी जलाता
कभी बुझाता था
कभी फॉर सक्वेयर
कभी गोल्ड फ्लेक पीता था