सहर का समय है
सड़क पड़ी खाली सुनसान है
इतनी शान्त है वह
जैसे दिन भर की चहल-पहल
से वह अभी अनजान है
कुछ कमी सी लग रही है
कुछ नमी सी लग रही है
न कोई युवा, न बच्चा
न कोई गाड़ी, न रिक्शा
सड़क तन्हा लग रही है
बिना वाहनों के सड़क
एकदम खाली है
तन्हा जैसे कोई छोरी है
मंज़र खाली सड़कों का
जैसे लुटी हुई तिजोरी है
गाड़ियों से सजी-सवरी
सड़कें हँसकर बोलती है
गाड़ियाँ उसकी दिल-धड़कन है
गाड़ी के बिना उसकी स्थिति
जैसे आभूषण के बिना दुल्हन है