बैठी थी मैं सोच के
के अभी है सुबह
पता ही नहीं चला
कब सुबह से हो गई शाम
सोचती थी मैं सही है
करती है सब छुपके
पर पता ही नहीं चला
कब से हो गई शरेआम
करना था मुझे अलग काम
बनाना था अपना नाम
पर पता नहीं चला
कब मैं हो गई बदनाम
दिन गुजर गए
गुजर गई कई शाम
पता ही नहीं चला
कैसे हो गई कड़वी जुबान
अब तो कुछ नहीं सूझता
जब तक अन्दर न जाए दो-तीन जाम
अब पता नहीं चलता
हम उनके पास जबरजस्ती गए
या बन के गए मेहमान