Sunday, 16 July 2023

पता नहीं

बैठी थी मैं सोच के
के अभी है सुबह
पता ही नहीं चला
कब सुबह से हो गई शाम

सोचती थी मैं सही है
करती है सब छुपके
पर पता ही नहीं चला
कब से हो गई शरेआम

करना था मुझे अलग काम
बनाना था अपना नाम
पर पता नहीं चला
कब मैं हो गई बदनाम

दिन गुजर गए
गुजर गई कई शाम
पता ही नहीं चला
कैसे हो गई कड़वी जुबान

अब तो कुछ नहीं सूझता
जब तक अन्दर न जाए दो-तीन जाम
अब पता नहीं चलता
हम उनके पास जबरजस्ती गए
या बन के गए मेहमान