Saturday, 31 December 2016

निर्णय

निर्णय ऐसा कर
हर कोई खुश हो जाए
कर्म ऐसा कर 
हर कोई करना चाहे 
पहल ऐसी कर 
हर कोई  जुड़ना चाहे   
बात ऐसी कर 
हर कोई सुनना चाहे 
बनाओ कुछ ऐसी नीति
बंद पड़े लघु उद्योग 
बंज़र पड़ी ज़्यादा ज़मीने 
फिर से खुशहाल हो जाएँ 
भारत को बना ऐसा 
हर कोई यहाँ आना चाहें 
लोग ऐसे चुन  
जो देश की तरक्की में 
चार चाँद लगाएँ 
हासिल करना है हमें
सोने की चिड़िया का वजुद
आगे आप चलो 
पीछे से हम आएँ  


Thursday, 29 December 2016

Jio बाज़ार

एक से दस 
दस से सौ 
सौ से हज़ार 
ऐसा मंज़र दिखता  है 
घर -घर, दरबार - दरबार

हर दूसरा - तीसरा आदमी 

हुआ है JIO का शिकार 
क्यों चली है ये फ्री सेवा 
कब होगा बंद ये बाज़ार

सुना है तीन महीने 
और चलेगी ये सेवा 
बचो इससे वरना 
कर देगा ये तुम्हें 
दिमागी तौर से बीमार

मैं नहीं कहता औरों को
खुद भी हूँ इसका शिकार    
बच्चों की परीक्षाएँ  हैं आने वाली 
पर दिखते हैं वह भी 
JIO की लत से बीमार

कब छूटेगी ये फ्री के पीछे 
भागने की हमारी आदत 
कुछ तो सोचें हम 
कुछ तो करे विचार 
कब होगा बंद ये  फ्री का बाज़ार 
कब होगा बंद ये  फ्री का बाज़ार


Saturday, 24 December 2016

संदेशा

संदेशा आया है 
तेरे गाँव से 
तुझे बुलाया है 

लिखा है 
तेरी माँ है बहुत बीमार 
तेरा ही नाम उसकी ज़ुबाँ में 
आ रहा है बार-बार 
कहती है दुनियावालो का 
मुझ से क्या लेना-देना 
मुझ से नहीं है किसी का सरोकार 
संदेशा आया है 
तुझे बुलाया है 

लिखा है
तू आना बस एक बार 
तुझे देखना चाहती है आखरी बार 
ये मत समझना कि 
माँ ने किए है कोई उपकार 
मैने तो बस 
अपना फर्ज़ निभाया है हर बार 
संदेशा आया है 
तुझे बुलाया है 

लिखा है 
तू न आया था 
जब मैं बीमार हुई थी पिछली बार 
वक्त नहीं है कहता है हर बार 
पिछले दो हफ़्ते से है माँ बीमार 
छाती में दर्द और
खून की उल्टियां हो रही है लगातार 
संदेशा आया है 
तुझे बुलाया है 

लिखा है 
वक्त मिले तो ज़रूर आना 
वरना उसे मेरी मौत में भी न बुलाना 
सवाल उठेगा 
क्या ऐसे होते है बेटे 
क्या कहेगा जमाना 
संदेशा आया है 
तुझे बुलाया है    


Friday, 16 December 2016

तेरे इंतज़ार में

तेरे इंतज़ार में
कब तक बैठें ओ जाना
तू न आई
आ गया तेरे इंतज़ार में मयखाना 
कुछ देर तो 
मैं रुका रहा
तेरे लिए सजाये आशियाने में
न आई तू हो गई बड़ी देर
चला गया फिर मैं मयखाने में

तेरे इंतज़ार में
कब तक बैठते ओ जाना
तू न आई
आ गया तेरे इंतज़ार में मयखाना 

उठा दिया मैंने भी जाम बारी-बारी
दिखने लगी मुझे हर तरफ़ तेरी परछाई
ठान लिया अब मैंने
सह लेंगे हम तेरी जुदाई
तेरे इंतज़ार में
कब तक बैठते ओ जाना
तू न आई
आ गया तेरे इंतज़ार में मयखाना 

है इस महफ़िल में
हर कोई अनजाना
कोई है ज़िंदगी से टुटा
कोई है प्यार में जला परवाना
तेरे इंतज़ार में
कब तक बैठते ओ जाना
तू न आई
आ गया तेरे इंतज़ार में मयखाना 

कुछ देर बाद ख़त्म हुआ नज़राना
ढूँढने लगे सभी अपना-२ ठिकाना
हम भी छोड़ चले मयखाना
हो गए घर के लिए रवाना
जी लेंगे अब हम तेरे बिना
ढूंढ लिया है हमने अपना ठिकाना
तेरी याद से पहले 
अब याद आता है हमको मयखाना
तेरे इंतज़ार में
कब तक बैठे रहते ओ जाना
तू न आई
आ गया तेरे इंतज़ार में मयखाना 


Thursday, 15 December 2016

पीने की आदत

तू जो हर रोज़ पीता है
वजह यही है
जो आज तेरा घर रीता है
 
छोड़ दिया तुझे
एक-एक  करके सबने
आज न साथ तेरे पत्नी -बच्चे
न तेरे माता पिता है

कल तक जो साथ थे
दोस्त -यार तेरे
टूट चूका उनसे
आज नाता है
ऐसी क्या खता हो गई तुमसे
क्या कभी सोचा है

है तू आज ज़िन्दगी के
उस मोड़ पर
जहाँ  न किसी से तेरा रिश्ता
न किसी से कोई नाता है

सुधार दे तू अपनी ये खता
अभी भी नहीं कुछ बीता है
ये भी कोई ज़िन्दगी है
जो पिने के लिए जीता है

अमल करोगे तो ये गीता है
वरना आज के वक़्त में कौन
किस को बोल सकता है
ये तो बस एक कविता है

छोड़ दे तू ये आदत
जो हर रोज़ पीता है
छोड़ दे तू ये आदत
जो हर रोज़ पीता है