Tuesday, 23 July 2019

लकड़हारा

कैसे होगा अब गुज़ारा
कौन सोचेगा हमारा
लकड़ी काटनी बंद हो गई
लकड़ी ही थी सहारा
अब क्या करेगा लकड़हारा

बाज़ार के लाला जी
लेते थे हमसे लकड़ी
अच्छी खासी थी उनकी दूकान
चलती भी खूब तकड़ी

लग जाती थी एक दिन में
आठ-दस गट्ठे हर रोज़
दिन को मैं लकड़ी काटता
शाम को पहुँचता दूकान हर रोज़

उनका भी काम चल रहा था
मेरी भी थी लगी मौज
अब मैं क्या करूँ
कहाँ करूँ काम की ख़ोज

मैंने तो कभी कोई
और काम भी नहीं किया
लकड़ियों की बदौलत है
अपना सारा जीवन जिया

अब मैं कहाँ जाऊँ
कहाँ करुँगा मैं काम
कौन देगा मुझे पैसे
लाला जी की तरह
हर रोज़ हर शाम