कैसे होगा अब गुज़ारा
कौन सोचेगा हमारा
लकड़ी काटनी बंद हो गई
लकड़ी ही थी सहारा
अब क्या करेगा लकड़हारा
बाज़ार के लाला जी
लेते थे हमसे लकड़ी
अच्छी खासी थी उनकी दूकान
चलती भी खूब तकड़ी
लग जाती थी एक दिन में
आठ-दस गट्ठे हर रोज़
दिन को मैं लकड़ी काटता
शाम को पहुँचता दूकान हर रोज़
उनका भी काम चल रहा था
मेरी भी थी लगी मौज
अब मैं क्या करूँ
कहाँ करूँ काम की ख़ोज
मैंने तो कभी कोई
और काम भी नहीं किया
लकड़ियों की बदौलत है
अपना सारा जीवन जिया
अब मैं कहाँ जाऊँ
कहाँ करुँगा मैं काम
कौन देगा मुझे पैसे
लाला जी की तरह
हर रोज़ हर शाम
कौन सोचेगा हमारा
लकड़ी काटनी बंद हो गई
लकड़ी ही थी सहारा
अब क्या करेगा लकड़हारा
बाज़ार के लाला जी
लेते थे हमसे लकड़ी
अच्छी खासी थी उनकी दूकान
चलती भी खूब तकड़ी
लग जाती थी एक दिन में
आठ-दस गट्ठे हर रोज़
दिन को मैं लकड़ी काटता
शाम को पहुँचता दूकान हर रोज़
उनका भी काम चल रहा था
मेरी भी थी लगी मौज
अब मैं क्या करूँ
कहाँ करूँ काम की ख़ोज
मैंने तो कभी कोई
और काम भी नहीं किया
लकड़ियों की बदौलत है
अपना सारा जीवन जिया
अब मैं कहाँ जाऊँ
कहाँ करुँगा मैं काम
कौन देगा मुझे पैसे
लाला जी की तरह
हर रोज़ हर शाम
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