Sunday, 5 January 2020

गाँव की बस

शाम को वह आती थी
सुबह-सुबह ही चली जाती थी
थोड़ी देर से ही सही
पर मंज़िल तक पंहुचा देती थी

लगता था वह ट्रांसपोर्ट की
सबसे पुरानी बस थी
जो हर रोज़ हमारे गाँव
आया-जाया करती थी

निकलती तो हर बार
वह समय से थी
पर कभी निश्चित
वक़्त में नहीं पहुँच पाती थी

कई बार तो वह
बीच राह में ही
बंद हो जाती थी
सवारियां इधर की न
उधर की रह जाती थी

लगता था उसका समय
हो गया था आराम करने का
क्यूँकि वह खटारा हो चुकी थी
रोज़-रोज़ की दवाईयों और ऑपरेशन से
शायद वो परेशान हो चुकी थी


No comments:

Post a Comment