Thursday, 5 November 2020

मेरी कल्पना

एक दिन आएगा
जब मानव तरस जाएगा
लाख कोशिश कर के भी
अपना वजुद नहीं बचा पाएगा

जितनी ज़्यादा गति से
बढ़ रहा है तू आधुनिकता की ओर
उतना ही कम समय
मानव इस धरती पर रह पाएगा

पैसों की मानसिकता वाला मानव
क्या पैसे ही खाएगा
एक दिन सब स्त्रोत समाप्त हो जाएगें
बस पैसा ही पैसा रह जाएगा

तू अपना समय निकाल चुका
आने वाला कैसे जी पाएगा
तेरी कामयाबी मूल्यहीन होगी उनको
बस परेशानियों का सबब बन जाएगा

कहेगा वह खुद तो चला गया
अब हमसे क्या उम्मीद करेगा
निरादर होगा तुम्हारा
जब भी कहीं जिक्र आएगा