Sunday, 23 September 2018

खिड़की

बैठी रहती थी मैं
कोठे की खिड़की में
एक शख़्स का वहाँ
आना-जाना था बसेरों में
कुछ देर वह देखता
फिर खो जाता अंधेरों में

हर शख़्स देखता था
मेरे जिस्म को हर शामों में
उस शख़्स ने पहचाना
मेरी रुह के दर्द को
उन ठिकानों में

कहते तो कई लोग थे
हमें अपना कोठे में
पर उस शख़्स जैसा
कोई न मिला
हमें ज़माने में

किसी से न हुई
ऐसी दिलगी
न जाने कितने आए
कितने गए
इन जिस्म की दुकानों में

मिल जाता हमें भी कोई अगर
ज़िंदगी के सफर में
तो कभी न आते हम
इन शमशानों में

न भूले हैं हम वो खुशी
जो मिलती थी उन उजड़े मकानों में
आज फिर से उजाला है
उस शख़्स की बदौलत
मेरे अंधेरे आशियानों में


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