आज न जान की कीमत
न ईमान की रही
आज न सम्मान की कीमत
न इन्सान की रही
न ईमान की रही
आज न सम्मान की कीमत
न इन्सान की रही
पशुओं से भी बत्तर
हो रहा है इन्सान का हाल
गुलामी करनी पड़ती है दिन रात
तब जा के मिलता है माल
हर इन्सान की अब
इन्सानियत है खत्म हो रही
हर एक बन गया स्वार्थी
ज़िंदगी है रो रही
आ रहा है इन्सान
जब तक किसी के काम
होगी तब तक उसकी इज्ज़त
फिर न रहेगा पता, न नाम
क्या होगी कीमत जान की
जनसँख्या है जो बढ़ रही
कोई जिए या मरे परवाह नहीं
ऐसी ज़िन्दगी हो रही है इंसान की
No comments:
Post a Comment