दो अज़नबी बैठे थे
एक की नज़र दाए
एक की नज़र बाए
कभी सीधी भी होती थी
पर कभी एक दूसरे को
नहीं देखती थी
एक अपनापन था
पर तन्हाई भी थी
एक की नज़र दाए
एक की नज़र बाए
कभी सीधी भी होती थी
पर कभी एक दूसरे को
नहीं देखती थी
एक अपनापन था
पर तन्हाई भी थी
बस कुछ इंचों
का था उनमें फासला
रोज़ का होता था
उनका साथ बैठना
फिर भी महीनो से
नहीं हुई थी उनमें बातें
जबकि एक ही बस में
रोज़ थे वह आते-जाते
एक अगर कुछ
पढ़ने लग जाता
तो दूसरा कान में हेड फोन
लगा कर गाने सुनता
अलग सा रिश्ता
बन गया था दोनों में
पर दोनों साथ बैठ कर भी
आपस में कोई बात न करता