Monday, 27 February 2023

वह दो

दो अज़नबी बैठे थे
एक की नज़र दाए
एक की नज़र बाए
कभी सीधी भी होती थी
पर कभी एक दूसरे को
नहीं देखती थी
एक अपनापन था
पर तन्हाई भी थी

बस कुछ इंचों
का था उनमें फासला
रोज़ का होता था
उनका साथ बैठना
फिर भी महीनो से
नहीं हुई थी उनमें बातें
जबकि एक ही बस में
रोज़ थे वह आते-जाते

एक अगर कुछ
पढ़ने लग जाता
तो दूसरा कान में हेड फोन
लगा कर गाने सुनता
अलग सा रिश्ता
बन गया था दोनों में
पर दोनों साथ बैठ कर भी
आपस में कोई बात न करता


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