एक समय था जब
एक कमाने वाला
दस खाने वाले थे
फिर भी कोई कमी नहीं
सब ख़ुशी से रहते थे
एक कमाने वाला
दस खाने वाले थे
फिर भी कोई कमी नहीं
सब ख़ुशी से रहते थे
आसानी से होता था
घर में सबका गुजारा
कोई चिन्ता में न रहते थे
पड़ जाती कोई जरूरत
होती अगर कोई कमी-पेशी
तो सब उसे ही कहते थे
समय के हिसाब से समय गुजारा
वो भी तो कोई लोग थे
कितने लोगों का भार होता
उस एक कंदे पर
फिर भी हँसी से उठाते थे
वक्त तब कैसा था
जब कमा कर देना भी
अपनी ख़ुशी समझते थे
क्या अहमियत है उनकी
इस बात को वो समझते थे
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