Thursday, 30 March 2023

मज़हबी झण्डे

जगह-जगह में
ये मज़हबी झण्डे क्यों
हमेशा लड़ने का कारण
मज़हब ही क्‍यों

विरोध जता कर
विरोध बता कर
भी हो सकता है
फिर ये मज़हबी झण्डे क्यों

घर के अंदर कुछ भी हो
बाहर झण्डे लगते है क्‍यों
घर आराम से रहने के लिए है
फिर भी वहाँ मज़हबी झण्डे क्‍यों

कैसी मानसिकता है ये
जलसों में भी मज़हबी झण्डे
तू मानव है, क्या ये काफी नहीं
झण्डे दिखाने जरुरी क्यों

कहते है खुदा के
बंदे है हम सभी
फिर दुनियाँ को मज़हबी झण्डे
दिखाते हो क्‍यों
मानव है सभी एक जैसे
पर साथ में ये झण्डे क्‍यों


Monday, 27 March 2023

मैं काम करूँगा

मज़दूर का बेटा
टिफिन लेकर कहता है
मैं भी साथ चलूँगा
आपका हाथ बटाऊॅंगा
बाबा मैं भी काम पे आऊॅंगा

छोड़ो हाथ मेरा माता
मैं बाबा के साथ जाऊॅंगा
छोटा हूँ तो क्या हुआ
कम से कम में
बाबा को पानी पिलाऊॅंगा

हमेशा कहते है बाबा
वक़्त आने पर सिखाऊॅंगा
मैं और कब तक इंतज़ार करूँ
धीरे-धीरे ही तो मैं भी
बाबा काम सिख जाऊॅंगा

मुझे साथ चलना है
मुझे सीखना है
मैं साथ आऊॅंगा
मैं भी आपका बेटा हूँ
बाबा काम कर के दिखाऊॅंगा


Tuesday, 21 March 2023

पेड़ की छाया

जैसे ही आता है
गर्मियों का मौसम
हर तरफ़ धुप ही धुप
शरीर हो जाता है नम

याद आती है तब
पेड़ की वो छाया
कहाँ दिखेगा पेड़ अब
क्या मिलेगा उसका साया

हर राहगीर का मुँह क्या
बदल जाती है पुरी काया
सोचता है बस दो पल
मिल जाए कहीं पेड़ की छाया

न कहीं ठण्डा पानी
न कहीं ठण्डी हवा
शान्त हो जाती प्यास भी
अगर मिलती पेड़ की ठण्डी छाया

पेड़ लगाना कितना जरूरी है
तब जा के समझ आया
साँस को रुकने से है
जब पेड़ ने बचाया


Monday, 6 March 2023

कैसे सोचा

हिन्द के नागरिक
ऐसा सोचते हैं
जो कपड़े नहीं पहनते
वह गरीब होते हैं

हिन्द के नागरिक
ऐसा सोचते हैं
वह कुछ नहीं कर पाते
जो कमज़ोर होते हैं

हिन्द के नागरिक
ऐसा सोचते हैं
जो कुछ नहीं बोलते
वह कुछ नहीं जानते हैं

हिन्द के नागरिक
ऐसा सोचते हैं
जो साधु-संत है बने
वह देश को कुछ नहीं देते हैं

हिन्द के नागरिक
ऐसा सोचते हैं
जो राजनीति में आता है
वह जनता की सेवा नहीं करते हैं


Friday, 3 March 2023

माँगते नहीं

है कृपा इतनी
उस रब की
मिल जाता है
जरूरत होती है जितनी
फिर भी किसी से माँगे
ये तो न इंसाफी होगी

जीवन जीने के लिए
खाना तो पड़ेगा ही
किस्मत के भरोसे
किसी को रोटी तो मिलती नहीं
कुछ भी हासील करने के लिए
कर्मो की लड़ाई तो लड़नी होगी

किसी से भी व्यर्थ
पैसा माँगना ज़िन्दगी नहीं
हमें अपना काम करना है
फिर सामने वाला जो दे
इच्छा से, उतना ही हम लेगें
वही हमारी दक्षिणा होगी  

कोई कुछ नहीं माँगता
संत न कोई योगी
जो भी है माँगने वाला
मनमर्जी का, वह है ढोंगी
कब तक किसी की भी
बातों में आती रहेगी जनता 
कब इस बारे में सोचेगी