जैसे ही आता है
गर्मियों का मौसम
हर तरफ़ धुप ही धुप
शरीर हो जाता है नम
याद आती है तब
पेड़ की वो छाया
कहाँ दिखेगा पेड़ अब
क्या मिलेगा उसका साया
हर राहगीर का मुँह क्या
बदल जाती है पुरी काया
सोचता है बस दो पल
मिल जाए कहीं पेड़ की छाया
न कहीं ठण्डा पानी
न कहीं ठण्डी हवा
शान्त हो जाती प्यास भी
अगर मिलती पेड़ की ठण्डी छाया
पेड़ लगाना कितना जरूरी है
तब जा के समझ आया
साँस को रुकने से है
जब पेड़ ने बचाया
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