Monday, 30 January 2023

डॉन की चुनौती

ख़बर फैला दो
हम आए हैं
इश्तिहार लगा दो
हम आए हैं 
अपने सुरक्षा कर्मियों
से कह दो
गोली चला दें
हमआए हैं


शहर के कोने-कोने में
नाके लगवा दो
हम आए हैं
हर थाने-चौकी की
पुलिस को ख़बर दो
हम आए हैं 
चपे-चपे पे कैमरे लगा दो
हम आए हैं


अपने विशेष लोगो से कह दो
तस्वीर दिखा दो हमारी
हम आए हैं
ईनाम की घोषणा कर दो
जो पकड़ेगा हमें
या ख़बर देगा
उसके दस लाख रुपये
क्यूँकि हम आए हैं
हम आए हैं


Friday, 27 January 2023

चहूँ ओर लूट

एक लुट रहा है
एक लूट रहा है
चारों ओर देख लो
यही नज़ारा दिख रहा है

खाने में भी लूट
पीने में भी लूट
सामान बिकेगा ताकि खुब
दिखावे के लिए है छूट

सामने वाला बड़ा शातिर है
उसे सब पता है
जाएगा कहाँ कोई
आएगा उसी के पास जब लगती है भूख

उसका बस सामान बिक जाए
थोड़ा बहुत मुनाफा हो जाए
कैसे भी सामान निकल जाए
वो तैयार है, बोलना पड़े झूठ चाहे 

बुद्दू बनाने की कोशिश
करता है पढ़े-लिखों को भी
अनपढ़ की तो बात छोड़ो
बोलता है जैसे ही कुछ पैसे बचे
छूटे नहीं है ये टॉफी ले लो


Tuesday, 24 January 2023

सत्ता की भूख

बड़ी ख़तरनाक ये भूख है
एक बार जो पुरी हो गई
बढ़ती जाती है फिर
होती रहती फिर चूक है

पहले समय के
राजा-महाराजा इसके सबूत है
अपनी सत्ता बढ़ाने के चक्कर में
खुद तो डूब गए
देश को भी गुलाम करा गए
हम उन्हीं की गलतियों को
आजतक है झेल रहे 

आज भी दिख रहा
हर तरफ वैसा ही दुःख है
उन्हें देश और जनता की
कोई भी चिन्ता नहीं
दिखती केवल सत्ता की भूख है

अपनी सत्ता का स्वार्थ-लालच
कर देता उन्हें मुक है
हो जाए कहीं दंगे-अहिंसा
वो कुछ भी बोलेंगे नहीं
बात को टाल कर चुप है

जनता फसी रहे सामाजिक
परेशानियों - कुरीतियों में
यही उनका सुख है
अरे जनता क्या सवाल पूछेगी उनसे
उनके जीवन में तो अभी कई दुःख है



Saturday, 21 January 2023

आरोपी

उसको सब पता है
उसकी क्या खता है
चार दिन का कारावास
न मिलनी है मौत की सजा
तभी तो हो रही उसकी मनमर्जी
यही उसकी निडरता की है वजा

एक आदमी दस को
मार के चला जाता है
इंसाफ आँख बंद कर
देखता ही रह जाता है
आती है जब-जब भी
उसकी मौत की बारी
तब मानव अधिकार के
नियम का उलंगन हो जाता हैहै

कब तक चलता रहेगा ऐसा
किसी की ज़िन्दगी ही चली जाए
उसके लिए वो एक तमाशा है
कानून के हर दाव-पेच
हर धारा उसको पता है
क्या कभी बदलनी ये परिभाषा है

कैसे कम होंगी वारदातें
वो तो पैसों के लिए
कुछ भी करने को तैयार है
बढ़ती जा रही है उसकी चाहते
कैसे मिलेगी उसे सजा
कौन ढूंढेगा उसके लिए वजा
जो करते है सजा की बातें
वही लोग है उसको बचाते



Wednesday, 18 January 2023

मज़बूरी का फ़ायदा

मान गया वो कैसे
काम करेगा ऐसे-ऐसे
देंगे उसे आधे पैसे
कोई न समझ पाया बात
क्यों उसकी सबसे दूरी थी
उसकी तो मज़बूरी थी

मिल जाए जो कुछ
वही बहुत उसके लिए
कितना कमाओगे उससे
मालूम है उसे पर बोल न पाया
क्यों उसकी सबसे दूरी थी
उसकी तो मज़बूरी थी

काम से काम किया उसने ज्यादा
न की कभी कोई चलाकी
न तोड़ा कभी अपना वादा
जितना काम बोला वो किया
फिर भी उसकी सबसे दूरी थी
न उसकी कोई हजूरी थी

अरे पैसों के लालची
न कर तू कोई ऐसा गुनाह
कि मिलनी मुश्किल हो जाए माफ़ी 
तूने तो उसको भी नहीं छोड़ा
जिसकी दिख रही मज़बूरी थी



Sunday, 15 January 2023

काला पानी

ढल रही थी जहाँ जवानी
बन रही थी वहाँ एक कहानी
दो वक़्त की रोटी का पता नहीं
मुश्किल से मिलता था पानी

रहते थे वहाँ आज़ादी के परवाने
जिन पे चढ़ी थी आज़ादी की मस्तानी
हर पल आज़ादी पाने का जूनून
इन्कलाब के गीत बोलती उनकी जुबानी

अलग-अलग रखा जाता सबको
विद्रोह की आवाज़ होती दबानी
फिर भी नहीं डरते थे वो
न दिखती चेहरे में कोई परेशानी

किसी को उड़ाया तोप से
किसी की फांसी से रवानी
न पैदा कर सके फिर भी दहशत
न ठण्डा कर पाए उबलता लाल पानी

मिटा के भी न मिटा सके
रह गई इतिहास के पन्‍नो में निशानी
भूल गए थे वो विदेशी
माँ थी वो हमारी काला पानी


Thursday, 12 January 2023

मन के सच्चे

बच्चे होते हैं
मन के सच्चे
न किसी से छुपाने का डर
न किसी से बताने का डर

साथी चाहिए उनको
कोई साथ खेलने के लिए
न उन्हें धर्म की परवाह
न उन्हें जाति का डर

निस्वार्थ भाव से
मिलते हैं वो सभी से
चल पड़ते हैं किसी के साथ भी
चॉकलेट या टॉफी के लालच से

कोई उन्हें हँसाए या रुलाए
नहीं नफरत उनके मन में
कौन अपना कौन पराया
नहीं रहते वो इस चिन्ता में

आज़ाद पंछी हैं वो
चले जाते हैं किसी के भी घर में
इधर-उधर चलना तोड़-फोड़ करना जारी
जैसे हो अपने ही घर में



Monday, 9 January 2023

भूल गए कानून

पैसे वालों के आगे
आदमी की तो क्या हिम्मत
उनके सामने न बोल पता है कानून

चले जाते हैं वो करके गुंडागर्दी
देखती रह जाती है जनता
आँख बंद कर देता है कानून

किसी को भी रास्ते से
किसी को दुनिया से उठाते हैं
फिर भी कुछ नहीं कर पता है कानून

वो तो रहते हैं आराम से
दहशत में रहती है जनता
उलझा रहता है कानून

खेल-खेल में कर देते हैं खून
न कोई सबूत न कोई ग्वाह
बस ढूंढ़ता रह जाता है कानून

क्यों थम गया है जूनून
क्या भूल गए है अपना काम
क्यों बदनाम हो रहा है कानून

कब बदलेगा ये रवैइया
गरीबो पर दहशत
पैसे वालों से दहशत में कानून




Thursday, 5 January 2023

पतन की ओर

चमक-दमक है सब कुछ
एक आधुनिकवादी के लिए
भागना है दिन-रात
क्या जी रहा है इसीलिए

उसे न खुद की चिंता है
न है प्रकृति की
उसे ही मिल जाए सब कुछ
चाहे बचे न बचे आनेवालों के लिए

रहना ही है जब
चार दिवारी के भीतर
फिर इतना बड़ा ताम-जाम
ये सब है किसके लिए

गुज़ारा जब दो
रोटी से चल सकता है
फिर ज्यादा से ज्यादा खाना
बनता है किसके लिए

आगे निकलने की वजह ढूँढता है
कभी तो सोच कारण रुकने के लिए
वैसे भी जितना तू भागेगा
हानिकारक होगा प्रकृति के लिए

तुम्हारा ये दिखावे का जुनून
अभिषाप बन जाएगा मानव के लिए
आने वालें कहेंगे हमारे पुर्वज
खुद तो आसमान में रहते थे
हमें धरती भी न छोड़ी जीने के लिए