Sunday, 15 January 2023

काला पानी

ढल रही थी जहाँ जवानी
बन रही थी वहाँ एक कहानी
दो वक़्त की रोटी का पता नहीं
मुश्किल से मिलता था पानी

रहते थे वहाँ आज़ादी के परवाने
जिन पे चढ़ी थी आज़ादी की मस्तानी
हर पल आज़ादी पाने का जूनून
इन्कलाब के गीत बोलती उनकी जुबानी

अलग-अलग रखा जाता सबको
विद्रोह की आवाज़ होती दबानी
फिर भी नहीं डरते थे वो
न दिखती चेहरे में कोई परेशानी

किसी को उड़ाया तोप से
किसी की फांसी से रवानी
न पैदा कर सके फिर भी दहशत
न ठण्डा कर पाए उबलता लाल पानी

मिटा के भी न मिटा सके
रह गई इतिहास के पन्‍नो में निशानी
भूल गए थे वो विदेशी
माँ थी वो हमारी काला पानी


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