Tuesday, 24 January 2023

सत्ता की भूख

बड़ी ख़तरनाक ये भूख है
एक बार जो पुरी हो गई
बढ़ती जाती है फिर
होती रहती फिर चूक है

पहले समय के
राजा-महाराजा इसके सबूत है
अपनी सत्ता बढ़ाने के चक्कर में
खुद तो डूब गए
देश को भी गुलाम करा गए
हम उन्हीं की गलतियों को
आजतक है झेल रहे 

आज भी दिख रहा
हर तरफ वैसा ही दुःख है
उन्हें देश और जनता की
कोई भी चिन्ता नहीं
दिखती केवल सत्ता की भूख है

अपनी सत्ता का स्वार्थ-लालच
कर देता उन्हें मुक है
हो जाए कहीं दंगे-अहिंसा
वो कुछ भी बोलेंगे नहीं
बात को टाल कर चुप है

जनता फसी रहे सामाजिक
परेशानियों - कुरीतियों में
यही उनका सुख है
अरे जनता क्या सवाल पूछेगी उनसे
उनके जीवन में तो अभी कई दुःख है



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