पैसे वालों के आगे
आदमी की तो क्या हिम्मत
उनके सामने न बोल पता है कानून
चले जाते हैं वो करके गुंडागर्दी
देखती रह जाती है जनता
आँख बंद कर देता है कानून
किसी को भी रास्ते से
किसी को दुनिया से उठाते हैं
फिर भी कुछ नहीं कर पता है कानून
वो तो रहते हैं आराम से
दहशत में रहती है जनता
उलझा रहता है कानून
खेल-खेल में कर देते हैं खून
न कोई सबूत न कोई ग्वाह
बस ढूंढ़ता रह जाता है कानून
क्यों थम गया है जूनून
क्या भूल गए है अपना काम
क्यों बदनाम हो रहा है कानून
कब बदलेगा ये रवैइया
गरीबो पर दहशत
पैसे वालों से दहशत में कानून
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