Thursday, 24 August 2017

70 साल

देखते ही देखते 
दिन गुज़र गए 
गुज़र गए आजादी के ७० साल 

सोचा करते थे बस 
आज नहीं तो कल 
कभी न कभी बदलेगा देश का हाल 

अब एहसास होने लगा है 
कुछ तो बदलाव होने लगा  है 
पकड़ रहा है देश जब से चाल 

होगा हर एक के साथ इन्साफ 
देना पड़ेगा अब सबको हिसाब -किताब
हो रहे थे जो सालों  से मालामाल 

अब न कोई दबा रहेगा 
अब न कोई डरा रहेगा 
सीधा -सीधा पुछेगा अब सवाल  

अब न कोई मजबूरी का फायदा उठाएगा 
न किसी को रोक पाएगा 
होगी कार्यवाई उस पर तत्काल 

सबको तुरन्त जवाब मिलेगा 
न रहे अब गाँधी के गाल 
नहीं बचेगा कोई अब करके बवाल 



Saturday, 15 July 2017

छाते

ऐसा नहीं है 
बरसात में है याद आते 
उनसे रिश्तों को क्या छुपाना 
उनसे है सालो से नाते 

बरसात में तो 
सभी है साथ उनका चाहते 
गर्मियों में भी 
कई लोगों को है ये बहाते 

सदाबहार है उनसे रिश्ता 
बड़ों को काला रंग 
बच्चों को है ये 
रंग -बिरंगे अच्छे लगते 

साल के दो महीने में 
जम कर है ये नहाते 
सुबह से शाम भीग कर भी 
अगले दिन के लिए है सुख जाते 

कई होते है बड़े मुल्यवान 
जो बड़े,विशेष लोगों को है बनते 
पर कीमत इतनी भी होती है 
की हर आदमी है खरीद पाते 


Saturday, 27 May 2017

इंतज़ार-फ़ौजी का

दिन गुजर जाते हैं  
गुजर गए हैं कई साल
किसको सुनाऊ अपना दर्द
किससे पूछूँ तेरा हाल -चाल 
कब आएगा घर तू फ़ौजी 
मुझे रहता है 
तेरा इंतज़ार हर साल  

तू है जिंदगी मेरी 
तू है तो लगती हूँ पूरी 
वरना जैसे हूँ कोई कंकाल 
जब होता है तू सामने 
लगती हूँ मैं भी सजने -सवरने 
वरना तेरे बिना फीका 
लगता है हर श्रृंगार 

सोचती रहती हूँ दिन -रात 
कब तक करना पड़ेगा 
मुझे यूँ तेरा इंतज़ार
आँखें तो बंद हो जाती है 
तेरी राह तकते -तकते 
पर बंद न हो पाते है 
ये दिल के दवार 

मिलता है जब भी तेरा पत्र 
खुद को लेती हूँ संभाल 
ख़बर मिलती है कि तू आने वाला है 
अब खत्म हो जाएगा मेरा इंतज़ार 
एक लहर सी दौड़ती है मेरे बदन में 
जैसे आ गई हो कोई बहार  


Saturday, 15 April 2017

युवाओं का नज़रिया

सोच अच्छी है
कर्म अच्छा है
जब कुछ नया देख लेता है
वह उलझ जाता है

जानें क्यों उसको
खुद के लोगों से ज्यादा
गैरों पे भरोसा है
बिना सोच-विचार करके
हर बात सच मान लेता है

विदेशों से आई हर वस्तु को
सबसे पहले वह अपनाता है
उसी का उपयोग करके
उसी के गुण गाता है

अपना देसी खाना छोड़ कर
विदेशी खाना वह खाता है
यहाँ उसे अच्छा नहीं लगता
इसलिए विदेश जाना चाहता  है

अपनी संस्कृति को बन्धन
औरों को अच्छी बताता है
अपने देश की हर कमी को
वह विदेशों से तोलता है

हमारे समाज से ज्यादा
विदेशी समाज उसे बहाता है
अपनी भाषा से ज्यादा
विदेशी भाषा वह बोलता है
पर वह नहीं जानता
दुनियाँ का हर नागरिक
इस देश को जानना चाहता है


Sunday, 2 April 2017

कुतों का कहर

हवा में पानी में 
मिला है पहले से ही जहर 
अब तो रास्तों में चलना भी
हो रहा है मुश्किल
दिखता है हर तरफ कुतों का कहर 

घूमने के बहाने 
कुतों को लाते है सड़कों पर  
फैलाते है  फिर गंदगी
कभी पार्को में और 
तो कभी पगडंडियों पर 

बड़ा खराब हो गया माहौल 
पालतू कुतों का सड़क पर 
आवारा कुतों का कहर 
बरस रहा है कभी बाइक वालों 
तो कभी पैदल चलने वालो पर 

बात करते है स्वच्छता पर 
शायद नहीं दिखता है उन्हें 
ये कुतों का असर 
कही गाँव में भी नहीं ऐसा मंज़र 
जो बना है आज शहर -शहर 

एक दिन की नहीं ये बात 
होता है हर शामो-सहर 
हमें तो कोई परेशानी नहीं 
बुरा असर न पड़े कहीं इसका 
क्या विचार करता है कोई इस पर 


Saturday, 18 March 2017

ललकार

जन्म से नहीं
कर्म से जात बनाओ
ओ धर्म के ठेकेदारों
अब तो समझ जाओ

कब तक बांटते रहोगे  
तुम इस देश को
कभी धर्म के नाम पर
कभी जात के नाम पर

कब तुम छोड़ेंगे
कटरवाद की धारणा को
क्या कभी जीने देंगें
तुम यहाँ इंसानों को

कब बंद करेंगे तुम
जनता के पैसों से
चलने वाली दुकानों को 
जीवन का समय है चार दिन
कब तक भरोगे खज़ानों को

कब तक धर्म परिवर्तन होता रहेगा
मानव अपने वजुद के लिए
क्या यूँ ही लड़ता रहेगा
क्या कभी कोई बोलेगा नहीं 
कब तक चलेगा ऐसा 
कब तक ये सब झेलता रहेगा 


Saturday, 4 March 2017

कैदी का घर

सामने दिखती हैं सलाखें 
खामोश है हर दीवार
तन्हाई करती हैं बातें
जब मैं जागता हूँ 
पाता हूँ दीवारों का घेरा
कोई नहीं जानता यहाँ मुझे 
एक नम्बर है अब नाम मेरा

एक अजब सी तन्हाई है इसमें
बैठा रहता हूँ तन्हा जिसमें
कहा एक शख्स ने
कल तक था यहाँ कोई और
अब है ये तेरा
न है इसमें किसी का आन-जाना
न है साथ में किसी का बसेरा

है यहाँ पीने के पानी का घड़ा 
वो रहता है कोने में पड़ा-पड़ा
सोने को है लोहे की खाट
उसमें बिछी रहती है एक टाट
आता है जब यहाँ खाना
होता है तब एक दिये से सवेरा
बाकी रहता है हर पल अँधेरा

कभी बैठ कर कभी सो कर
है मैंने यहाँ दिन गुज़ारा
मालूम नहीं पड़ता कब शाम
कब होता है सवेरा
देखता हूँ जब बहार को
पाता हूँ दो आदमियों का 
है मुझ पे पहरा 



Friday, 24 February 2017

तू चुप क्यों

नाम है तेरा झूठा 
औलाद है तू गैरों की 
उनपे अत्याचार हुआ 
तू झट से बोल पड़ी 
हमारा तो घर ही उजड़ गया 
फिर भी तू चुप रह गई 

कुछ तो बात है राज़ की 
क्यों तुझे उनसे मोहब्बत 
हमारे लिए तूने आवाज़ ही बदल दी 
भूल मत जाना तू उसकी मर्ज़ी से 
चलती है दुनिया में साँसे सबकी 
पड़ेगी जिस दिन तेरे सर उसकी लाठी 
उस दिन हिल जाएगी तेरी हस्ती ही 

मानवता को देख तू   
किसी एक मज़हब को नहीं 
प्यार की भावना चाहिए इस देश में 
कोई नफ़रत की दीवार नहीं 
है अगर तु बांटने की कोशिश में लगी 
तो इतना जान ले 
ये किसी की भी इच्छा है या हो चाहत 
ये कभी पूरी नहीं होगी  

जिन्होंने सहा है उन्होंने कहा है 
हमें मुआवजा नहीं न्याय चाहिए 
जिन्होंने दुष्कर्म किए है 
वह जेल की सलाखों के पीछे होने चाहिए 
पर वह इंसाफ दिलाने के बजाए कहती है 
वहाँ से छोड़ कर कहीँ और जाना चाहिए 



नर्स

वह आती थी  
वह जाती थी 
डॉक्टर साहब आएगे 
चैक कर के बताएगे 
वह कहती थी 

मैं तो अनपढ़ था 
मेरी समझ में ही 
बात नहीं आती थी 
कोई प्यार से 
कोई गुसे से बताती थी 

रंग - बिरंगी दवाईयां 
वह मुझे दे जाती थी
कब कौन सी खिलानी  है 
वह मुझे बताती थी 
मैं उलझ जाता था उनमे 
वह आके सुलजाती थी  

मेरा बच्चा ठीक है 
कह कर, कभी हँसाती थी
कभी इसका ऑपरेशन होगा 
क्या तुम्हारे पास पैसे है 
कह कर रुलाती थी 


Friday, 10 February 2017

रैन बसेरा

कहाँ होगा अब बसेरा 
कहाँ होगा अब सवेरा 
कहने को है जग तेरा 
कहने को है जग मेरा 
फिर क्यों  नहीं  है 
बसेरा यहाँ तेरा -मेरा 

छोड़ के  तो गए  है 
अब हम वह मोहल्ला  
जीना तो पड़ेगा भाई 
सबको अकेला-अकेला
मान लो यही है भाग्य हमारा 
कुछ भी हो जाए 
वापिस तो नहीं जाना है दोबारा  

कैसे भी गुजार लेंगे ठंडी रातें
मुश्किल है शायद अब  
कंबल-रज़ाई से मुलाकातें 
थे तो वह अपने ही 
फिर भी जाने क्यों 
करते थे बेगानों सी बातें 

काटनी है जाड़े  की हर रात 
अब हमें सड़कों पर    
खुदा है मालिक सबका 
वही है सबका सहारा 
कितना जियेंगे क्या मालूम 
अब आगे का भविष्य 
तय होगा उसके द्वारा    


   

Thursday, 26 January 2017

विनती

है  ये  विनती 
पढ़ने वालों से 
भविष्य में भारत को 
आगे ले जाने वालों से 
खुद को जानो -पहचानो
यही विनती है आने वालों से 

है  ये  विनती 
मंज़िल मिलने से पहले 
भाग जाने वालों से 
है  ये  विनती
मुसीबत को देख कर 
रास्ता बदलने वालों से 

न हटो तुम 
पीछे हार के 
हार के ही जीत मिलती है 
जा कर पूछ लो जीतने वालों  से 
नहीं बचोगे तुम भाग कर भी 
जा कर पूछ लो भागने वालों से  

विनती है करो तुम डट कर 
मुकाबला हर मुश्किलों से 
क्या होगा - क्या होगा 
निकाल दो ये विचार दिल से 
जीना तो है ही हर हाल में 
फिर क्या घबराना मुश्किलों  से  


Sunday, 22 January 2017

भिखारी की कुटिया

स्टेशन के साथ ही   
उसकी टूटी -फूटी कुटिया थी 
वहाँ पर एक खाट 
कोने में मिट्टी का मटका
एक गिलास एक थाली 
पानी के लिए एक लुटिया थी 

थाली में कभी पाव 
कभी सुखी रोटी होती थी 
पिने के लिए तकिये के साथ 
बिस्लेरी की बोतल रखी थी
सहारे के लिए उसने 
एक सोठी रखी होती थी 

बाँस के पाँच -छः डंडो से 
बनी वह कुटिया थी 
फिल्मी बैनरो से बनी   
उसकी छत और दीवारें थी 
कभी इसमें ठण्ड 
कभी गर्मी होती थी 

दशा उसकी  बड़ी दयनीय 
पहनी उसने धोती फटी थी 
शक्ल उसकी काली -कलुटी  
राख -कोयले के जैसे थी  
ऐसे सलाम करता पुलिसवालों को 
जैसे उनसे उसकी जान पहचान थी 


Wednesday, 18 January 2017

हिमाचल का पर्यठन

देव भूमि है हिमाचल  
हज़ारो देवी -देवताओं का
वास है यहाँ
वन भूमि है हिमाचल 
हज़ारो रंग के पेड़-पौधे
हर नज़ारा खास है यहाँ
शान्त भूमि है हिमाचल
हर तरफ अमन 
शान्ति है यहाँ 
हिम के आँचल में 
हिमाचल में 
ऐसा है हिमाचल में 

कल-कल करते
दिखते है झरने यहाँ 
सदाबहार बर्फ से ढके
रहते है पर्वत यहाँ 
हर तरफ  हर 
सुबह -शाम दीखते है 
अदभुत नज़ारे यहाँ 
एक बार जो आए 
दोबारा आना 
चाहता है वह यहाँ 
हिम के आँचल में 
हिमाचल में 
ऐसा है हिमाचल में 

जगह-जगह पर है
बहती नदियाँ यहाँ 
प्राकृतिक झीलों का भी 
सौन्दर्य है अदभुत यहाँ 
हर धर्म के मंदिर,मस्ज़िद
चर्च और गुरुदवारे है यहाँ 
राजा -महाराजा के 
महल बताते है 
उनकी रियासतों का 
इतिहास यहाँ 
हिम के आँचल में 
हिमाचल में 
ऐसा है हिमाचल में 

कोने कोने में है 
पर्यटन स्थल यहाँ 
सबसे मशहूर 
स्थल है शिमला
मनाली,धर्मशाला
और चम्बा यहाँ 
हिम के आँचल में 
हिमाचल में 
ऐसा है हिमाचल में  

छोटे-बड़े गांव 
और शहरो में
लगते हैं मेले यहाँ 
त्योहारों की भी
लगी होती है 
बहार यहाँ 
होती है हर फसल
की खेती यहाँ 
सबसे ज्यादा सेब की 
पैदावार यहाँ   
हिम के आँचल में 
हिमाचल में 
ऐसा है हिमाचल में  


Sunday, 15 January 2017

सुसाइड नोट

कहती थी मैं  
अपने माँ -बाबा से 
मैं पढ़ना चाहती हूँ 
मैं भी आगे बढ़ना  चाहती हूँ 
पर उन्हें कहाँ मेरी परवाह थी 
उन्हें अपनी इज़्जत की पड़ी थी 

मेरी शादी करवाना चाहते थे वो 
इसलिए मैं कई दिनों से
बंद कमरे में पड़ी थी 
सोचते थे मैं किसी 
और के साथ भाग जाऊँगी  

पर कौन विशवास करेगा मेरा  
किसे मैं अपना दर्द बताऊँगी 
जा रही हूँ मैं जिन्दगी से 
मौत की तरफ आज 
अब न दिखूंगी मैं 
न सुनाई देगी मेरी परवाज 

कहती हूँ समाज से भ्रूण हत्या होनी चाहिए 
हमारी आँख खुलने से पहले ही सोनी चाहिए 
जवान होती है जब एक लड़की 
लगता है मॉस का टुकड़ा अपना शरीर उसे 
खाने के लिए है हज़ारो तैयार जिसे

क्या लड़की होना अभिशाप है 
क्या लड़की को जन्म देना पाप है 
किसी की मर्जी के बिना 
उसकी शादी करवाना 
ये कैसा इन्साफ है 

इससे अच्छा है कि  हम 
माँ के पेट में ही मर जाए 
दुनियाँ में आकर भी तो 
लोग हमसे भेद -भाव ही करते है 
फिर हम दुनियां में किसलिए आए 


Thursday, 12 January 2017

ठण्डी

आई है ठण्डी -आई है ठण्डी
छाई है ठण्डी -छाई है ठण्डी
पी ले गर्म चाय की पायली
दूर भगा दे ये ठण्डी

हाथ क्या मले है तु
फुक - फुक के
खत्म हो गई है
होंटो की लाली सुख के

किसी को नहीं छोड़ती है ये 
बना देती सबको सुखी डंडी
चाहे कोई घर में बैठे रहे
या खड़ा हो जाए सब्जी मंडी

न छोड़े ये बच्चो को
न बच पाए इससे बड़े भी
चाहे हो कोई सजन
या हो कोई पाखंडी  

जहाँ तक जा सकती है नज़र 
वहाँ तक दिखती है सफेद झंडी 
करो जल्दी कोई उपाय
इससे बचने का वरना 
ये तो होती है बड़ी टोन्डी  



Thursday, 5 January 2017

दंगों का दर्द

बेवजह गम क्यों   
देता है कोई 
आँख हुई नम
तो क्या करेगा कोई 

उजाड़ के चला गया 
वह बसन्त बस्ती को 
बच्चे माँ के बिना 
माँ बच्चों के बिना हो गई 

देखनी थी जिन नन्ही 
आँखों को ये दुनियाँ 
वक्त से पहले 
क्यों वह सो गई 

चलना था जिसको 
अभी आगे बहुत 
अब अपंग हो गई 
भीड़ में रहते भी 
क्यों वह तन्हा हो गई 

क्या हर तरफ दहशत 
का मंजर चाहिए इनको 
कैसी ये मानवता हो गई 
लड़ने वालों का पता नहीं 
ये कैसी शरेआम जंग हो गई 

क्यों आदमी को 
आदमी खटकता है 
क्यों नाराज़ हो गया है कोई 
कब तक होते रहेंगे ये दंगें 
क्या इंसाफ करेगा कोई 

बड़े -बड़े नेताओं की 
बड़ी -बड़ी बातें हो गई 
कहते हैं कार्यवाही सख्त होगी 
पर बरबाद तो 
हो गया है कोई