Monday, 30 October 2023

कब तक भागेगा

कल तुने घर को
आज देश को
छोड़ दिया
कल तुने यारों को
आज अपने परिवारों को
छोड़ दिया

हुआ जो तेरा हाल है
इसके ऊपर मेरा एक सवाल है
किसी के कहने पर या
खुद सोच कर, किसी को देख कर
तुने ये फैसला लिया
या कोई जाल है

यहाँ बड़ी बातें करता था
मॉडर्न ज़माने की
वहाँ सब कुछ मिलेगा
जो तेरी चाहत थी
अब ऐसा क्या हो गया
जो तु सर झुकाए खड़ा
क्या इसमें मिली राहत थी

भाग और आगे भाग
हम भी तो देखें
कब तक भागेगा
अभी सोया है तू नींद में
आएगी वो भी सुबह
जब तूम जागोगे


Monday, 25 September 2023

खेती

मेरी इज्ज़त है खेती
यही रोटी मुझको देती
इसी के दम पे हूँ खड़ा
किसी के आगे न झुकने देती

मुश्किल है थोड़ा काम
मेहमत तो है करनी पड़ती
न किसी की रोक -टोक
अपनी मर्ज़ी की है ज़िन्दगी होती

जो चाहिए वही फसल उगा दो
बचे तो बेच दो
कुछ भी व्यर्थ नहीं जाती
हर फसल है बाज़ार में बिकती

हर किसान को करो प्रोत्साहित
तभी चलेगी और बढ़ेगी खेती
नयी पीढ़ी का तो पता नहीं
दो पल के लिए भी नहीं उठते गैंती

उन्हें न बनानी, न है पकानी आती
उन्हें खानी आती है बस रोटी
उनकी पहली पसंद है बर्गर, पीज़ा
फिर क्या करेंगे वह खेती


Tuesday, 5 September 2023

संरक्षण

कुछ तो करो उपाय
वरना लिखा जाएगा
मानव का काला अध्याय
मिलेगा नहीं जब कहीं पानी
तब करेगा मानव हाय-हाय

किसी के पास वक़्त नहीं
पानी की किसी को कोई चिन्ता नहीं
उन्हें तो पानी मिलना चाहिए
चाहे पैसों के लिए क्‍यों नहीं
उनकी प्यास बुझानी चाहिए बाकी कुछ नहीं

जो पानी कभी मुफ्त मित्रता था
आज बिना पैसों के मिलता नहीं
जो आज पैसों से मिल रहा है
शायद कल पैसों से भी मिलेगा नहीं
जागो अभी भी, वरना सबकी खैर नहीं

अब समय-समय पर वर्षा होती नहीं
बर्फ भी अब पहाड़ों में ज्यादा दिखती नहीं
एक बात सुन लो -ओ व्यस्त लोगों
बिना पानी के ज्यादा दिन
ज़िन्दगी यहाँ टिकती नहीं

करो तुम कुछ संरक्षण के उपाय
वरना लग जाएगी पानी की हाय
कोई नहीं बचेगा इसके कहर से
इसलिए वक़्त रहते पढ़े-लिखे लोगों जागो
करो कुछ प्रकृति के हित में उपाय


Tuesday, 15 August 2023

समय आएगा

अभी चिन्ता मत करो
दुनियाँ को बदलने की
तुम्हें भी मौका मिलेगा
आएगा तुम्हारा समय भी

उनका अपना मत है
तुम्हारा अपना मत है
हर बात पे न टोको
आएगा तुम्हारा समय भी

सम्भाला है बहुत उन्होंने
अपनी विरासत को
खुद तो आगे बड़े
साथ लेके चलते है ज़माने को

हर क्षण चलना पड़ेगा
हर क्षण पड़ेगा बोलना भी
बस तुम तैयार रहो
आएगा तुम्हारा समय भी

सब कुछ है सामने
कुछ न चला जाएगा
दुनियाँ देखेगी क्या करोगे तुम
जब तुम्हारा समय आएगा


Sunday, 16 July 2023

पता नहीं

बैठी थी मैं सोच के
के अभी है सुबह
पता ही नहीं चला
कब सुबह से हो गई शाम

सोचती थी मैं सही है
करती है सब छुपके
पर पता ही नहीं चला
कब से हो गई शरेआम

करना था मुझे अलग काम
बनाना था अपना नाम
पर पता नहीं चला
कब मैं हो गई बदनाम

दिन गुजर गए
गुजर गई कई शाम
पता ही नहीं चला
कैसे हो गई कड़वी जुबान

अब तो कुछ नहीं सूझता
जब तक अन्दर न जाए दो-तीन जाम
अब पता नहीं चलता
हम उनके पास जबरजस्ती गए
या बन के गए मेहमान


Friday, 9 June 2023

ऐसा क्‍यों

पंछी ने
आँगन आना छोड़ दिया
कोयल ने
सुबह गाना छोड़ दिया

बच्चों ने
खेलना छोड़ दिया
बड़ो ने
बोलना छोड़ दिया

जवानों ने
घर से निकलना छोड़ दिया
बजुर्गों ने
घूमना ही छोड़ दिया

माताओं ने
घर में खाना बनाना छोड़ दिया
विद्वानों ने
प्रवचन देना ही छोड़ दिया

बारिश ने
समय से आना छोड़ दिया
तपती धरती की
प्यास बुझाना छोड़ दिया


Tuesday, 30 May 2023

लेडी कंडक्टर

लगती है वह
एक सीधी-साथी लड़की
है उसकी एकल सीट
पास में है उसके खिड़की

वही से वो बोलती
बस कहाँ-कहाँ है जाती
वहीं से सबको
वो जवाब दे देती

मुँह में उसके विसल
हाथ से ही इशारा करती
किसी को वो बाहर
किसी को अन्दर है करती

सब जाते पास उसके
टिकट काटने के लिए
शायद प्यार से बोलेगी लड़की
बात करने लगे सभी
ये तो पुरी कंडक्टर है
जब वो एक पर भड़की


Sunday, 7 May 2023

ज़िन्दगी वही थी

ज़िन्दगी को ढूंढ़ने
हम कहाँ चले थे
कह गए जिनको बुरा
लोग वही भले थे

हर ख़ुशी नसीब हुई
जब उनके साथ चले थे
कितना गलत किया उनके साथ
सब समझ आ गया
जब लोग हमारी ज़िन्दगी से खेले थे

ज़िन्दगी की सच्चाई
हम ज़रा देर से समझे थे
अपनो को कभी गैर
अज़नबी को अपना समझे थे

हम क्या है और
खुद को क्‍या समझे थे
हम अपनी धुन में मस्त
किसी की बात कहाँ सुनते
लोग तो बहुत कुछ बोलते थे

अब मान लिया है
ज़िन्दगी वही थी
जो हम जी गए
बाद में तो दिन काटते थे
दो पल जिन्दगी के लिए
पल-पल मरते थे


Sunday, 30 April 2023

पुराने नोट

जब टटोला धोने को
मैंने अपना कोट
ढूंढ़ते-ढूंढते मुझे
उसमें मिला पुराना नोट

कुछ देर देख कर सोचा
कुछ नहीं बदला
वही गाँधी है
वही पाँच सौ का नम्बर
कहने को बदल गया है नोट

मिल जाता है जब भी
कहीं भी किसी को
कभी भी पुराना नोट
हो जाता है सर में दर्द
दिल में लग जाती है चोट

सोच में पड़ गया मैं
क्या करूँ अब इसका
खत्म हो गई है वैधता
न चढ़ा सकता हूँ कहीं भेंट

कागज़ का टुकड़ा बन कर
रह गया है अब ये नोट
न कोई सम्मान मिलता
न मिलते है अब वोट


Thursday, 27 April 2023

तत्काल की लाइन

तत्काल की लाइन में
लगना नहीं इतना आसान
या वक़्त गवाना पड़ता है
या करने पड़ते है पैसे कुर्बान

यहाँ नहीं चलता है
किसी का भी सिक्का
न चलती है
किसी की जान पहचान

न कोई छोटा
न कोई बड़ा
सब लगते लाइन में एक समान

जो करता है दादा बनने की कोशिश
उसे दो मिनट में सीधा
कर देते हैं यहाँ इन्सान

लगे रहना पड़ता है
बस लाइन में
न चुप रहना पड़ता है
न चलानी पड़ती है ज्यादा जुबान

कोई अगर गलत तरीके से
घुसने की कोशिश करता है
बस बरसने लगते है उस पर
जैसे हो वो कोई शैतान

पंद्रह-सोलाह घण्टे होती है
जनता लाइन में परेशान
फिर भी नहीं कन्फर्म टिकट
कब निकालेगा रेलवे इसका समाधान


Saturday, 15 April 2023

रिश्तों के नाम

अजब है गजब है
हमारा हिंदुस्तान
यहाँ एक नहीं दो नहीं
कई है रिश्तों के नाम

सब से है अलग रिश्ता
सबके लिए है अलग नाम
चाहे कोई अपना

या हो कोई अनजान
हो कोई भी रिश्ता
अदब से बोलना समझते है अपनी शान
चाहे विदेशों से ही क्‍यों न

आ जाए कोई मेहमान
बस शुरू हो जाए बातों का सिलसिला
फिर पल्न में बता देतें है

क्या है उनसे उनका रिश्ता
जैसे ही हो जाती है जान-पहचान
यहाँ तो पशुओं से रिश्ता है
उनसे तो छोड़ो

वह तो है इन्सान
हर एक रिश्ते का है नाम
चाहे हो वह पंडीत
या हो कोई विद्वान्‌



Thursday, 30 March 2023

मज़हबी झण्डे

जगह-जगह में
ये मज़हबी झण्डे क्यों
हमेशा लड़ने का कारण
मज़हब ही क्‍यों

विरोध जता कर
विरोध बता कर
भी हो सकता है
फिर ये मज़हबी झण्डे क्यों

घर के अंदर कुछ भी हो
बाहर झण्डे लगते है क्‍यों
घर आराम से रहने के लिए है
फिर भी वहाँ मज़हबी झण्डे क्‍यों

कैसी मानसिकता है ये
जलसों में भी मज़हबी झण्डे
तू मानव है, क्या ये काफी नहीं
झण्डे दिखाने जरुरी क्यों

कहते है खुदा के
बंदे है हम सभी
फिर दुनियाँ को मज़हबी झण्डे
दिखाते हो क्‍यों
मानव है सभी एक जैसे
पर साथ में ये झण्डे क्‍यों


Monday, 27 March 2023

मैं काम करूँगा

मज़दूर का बेटा
टिफिन लेकर कहता है
मैं भी साथ चलूँगा
आपका हाथ बटाऊॅंगा
बाबा मैं भी काम पे आऊॅंगा

छोड़ो हाथ मेरा माता
मैं बाबा के साथ जाऊॅंगा
छोटा हूँ तो क्या हुआ
कम से कम में
बाबा को पानी पिलाऊॅंगा

हमेशा कहते है बाबा
वक़्त आने पर सिखाऊॅंगा
मैं और कब तक इंतज़ार करूँ
धीरे-धीरे ही तो मैं भी
बाबा काम सिख जाऊॅंगा

मुझे साथ चलना है
मुझे सीखना है
मैं साथ आऊॅंगा
मैं भी आपका बेटा हूँ
बाबा काम कर के दिखाऊॅंगा


Tuesday, 21 March 2023

पेड़ की छाया

जैसे ही आता है
गर्मियों का मौसम
हर तरफ़ धुप ही धुप
शरीर हो जाता है नम

याद आती है तब
पेड़ की वो छाया
कहाँ दिखेगा पेड़ अब
क्या मिलेगा उसका साया

हर राहगीर का मुँह क्या
बदल जाती है पुरी काया
सोचता है बस दो पल
मिल जाए कहीं पेड़ की छाया

न कहीं ठण्डा पानी
न कहीं ठण्डी हवा
शान्त हो जाती प्यास भी
अगर मिलती पेड़ की ठण्डी छाया

पेड़ लगाना कितना जरूरी है
तब जा के समझ आया
साँस को रुकने से है
जब पेड़ ने बचाया


Monday, 6 March 2023

कैसे सोचा

हिन्द के नागरिक
ऐसा सोचते हैं
जो कपड़े नहीं पहनते
वह गरीब होते हैं

हिन्द के नागरिक
ऐसा सोचते हैं
वह कुछ नहीं कर पाते
जो कमज़ोर होते हैं

हिन्द के नागरिक
ऐसा सोचते हैं
जो कुछ नहीं बोलते
वह कुछ नहीं जानते हैं

हिन्द के नागरिक
ऐसा सोचते हैं
जो साधु-संत है बने
वह देश को कुछ नहीं देते हैं

हिन्द के नागरिक
ऐसा सोचते हैं
जो राजनीति में आता है
वह जनता की सेवा नहीं करते हैं


Friday, 3 March 2023

माँगते नहीं

है कृपा इतनी
उस रब की
मिल जाता है
जरूरत होती है जितनी
फिर भी किसी से माँगे
ये तो न इंसाफी होगी

जीवन जीने के लिए
खाना तो पड़ेगा ही
किस्मत के भरोसे
किसी को रोटी तो मिलती नहीं
कुछ भी हासील करने के लिए
कर्मो की लड़ाई तो लड़नी होगी

किसी से भी व्यर्थ
पैसा माँगना ज़िन्दगी नहीं
हमें अपना काम करना है
फिर सामने वाला जो दे
इच्छा से, उतना ही हम लेगें
वही हमारी दक्षिणा होगी  

कोई कुछ नहीं माँगता
संत न कोई योगी
जो भी है माँगने वाला
मनमर्जी का, वह है ढोंगी
कब तक किसी की भी
बातों में आती रहेगी जनता 
कब इस बारे में सोचेगी


Monday, 27 February 2023

वह दो

दो अज़नबी बैठे थे
एक की नज़र दाए
एक की नज़र बाए
कभी सीधी भी होती थी
पर कभी एक दूसरे को
नहीं देखती थी
एक अपनापन था
पर तन्हाई भी थी

बस कुछ इंचों
का था उनमें फासला
रोज़ का होता था
उनका साथ बैठना
फिर भी महीनो से
नहीं हुई थी उनमें बातें
जबकि एक ही बस में
रोज़ थे वह आते-जाते

एक अगर कुछ
पढ़ने लग जाता
तो दूसरा कान में हेड फोन
लगा कर गाने सुनता
अलग सा रिश्ता
बन गया था दोनों में
पर दोनों साथ बैठ कर भी
आपस में कोई बात न करता


Saturday, 18 February 2023

ये कैसे दिन

कैसे दिन आ गए हैं
दुध बेचने वाले आज
पीने वालों को ढूँढ रहे हैं

पर पीने वाले
कहीं और ही व्यस्त हैं
वो शराब के ठेके दूँढ रहे हैं

नहीं फिर भी कोई राज़ी
दुध वाले घर-घर जा कर
दुध दे रहे हैं

पर पीने वाले शख्स 
हर दूसरे तीसरे दिन
ठेके में जा कर
शराब ले रहे हैं

कहते हैं दुध वाले को
वो दुध का पैसा
ज्यादा ले रहे हैं
पर शराब को नहीं बोलते
जिसे mrp से भी ज्यादा 
मुल्य दे कर ले रहे हैं 


Sunday, 12 February 2023

चुनाव प्रचार

गूँज रही है आवाज़ें
उठ रही है लहर
जीतेगा भाई जीतेगा
अपना नेता जीतेगा
ऐसे हो रहा है प्रचार

लगें है पोस्टर गली-गली
घर-घर हर दीवार
सजने लगी है सड़कें
रंग-बिरंगी झंडिओ से
जैसे सावन आ गया हो
समय से पहले इस बार

काम किया है और
करते रहेगें हर बार
हमारे लिए तो सेवा है राजनीति
उनके लिए है व्यापार

एक नहीं है
खड़े हैं कई उम्मीदवार
कौन जीतेगा-कौन जीतेगा
फ़ैल रहा है ये समाचार
कौन बनेगा इस बार मंत्री
किसकी आएगी सरकार


Monday, 6 February 2023

बदला क्‍या

एक समय था जब
एक कमाने वाला
दस खाने वाले थे
फिर भी कोई कमी नहीं
सब ख़ुशी से रहते थे

आसानी से होता था
घर में सबका गुजारा
कोई चिन्ता में न रहते थे
पड़ जाती कोई जरूरत
होती अगर कोई कमी-पेशी
तो सब उसे ही कहते थे

समय के हिसाब से समय गुजारा
वो भी तो कोई लोग थे
कितने लोगों का भार होता
उस एक कंदे पर
फिर भी हँसी से उठाते थे

वक्‍त तब कैसा था
जब कमा कर देना भी
अपनी ख़ुशी समझते थे
क्या अहमियत है उनकी
इस बात को वो समझते थे


Friday, 3 February 2023

तेरे सहारे

तू न रहा अगर कभी
तो हम किसे पुकारे
आए हैं तेरे भरोसे
इस शहर में हम तेरे सहारे

तू है तो है ज़िन्दगी
तेरे संग हर नज़ारे
तू है तो है पतझड़ भी बसंत
तेरे संग हर बहारे

तू है तो है ठहराव ज़िन्दगी में
वरना हम तो हैं बनजारे
तेरे बिना हम बीच मझदार में
न मिलते है कभी किनारे

तुझ से है हम सवरे
तुने ही है सवारे
तेरे बिना एक पल भी
नहीं है ज़िन्दगी के विचारे

तुझसे है मेरी साँसे
तुझसे जुड़े धागे सारे 
तेरे संग है चाँदनी राते
तेरे संग है उजले सितारें


Monday, 30 January 2023

डॉन की चुनौती

ख़बर फैला दो
हम आए हैं
इश्तिहार लगा दो
हम आए हैं 
अपने सुरक्षा कर्मियों
से कह दो
गोली चला दें
हमआए हैं


शहर के कोने-कोने में
नाके लगवा दो
हम आए हैं
हर थाने-चौकी की
पुलिस को ख़बर दो
हम आए हैं 
चपे-चपे पे कैमरे लगा दो
हम आए हैं


अपने विशेष लोगो से कह दो
तस्वीर दिखा दो हमारी
हम आए हैं
ईनाम की घोषणा कर दो
जो पकड़ेगा हमें
या ख़बर देगा
उसके दस लाख रुपये
क्यूँकि हम आए हैं
हम आए हैं


Friday, 27 January 2023

चहूँ ओर लूट

एक लुट रहा है
एक लूट रहा है
चारों ओर देख लो
यही नज़ारा दिख रहा है

खाने में भी लूट
पीने में भी लूट
सामान बिकेगा ताकि खुब
दिखावे के लिए है छूट

सामने वाला बड़ा शातिर है
उसे सब पता है
जाएगा कहाँ कोई
आएगा उसी के पास जब लगती है भूख

उसका बस सामान बिक जाए
थोड़ा बहुत मुनाफा हो जाए
कैसे भी सामान निकल जाए
वो तैयार है, बोलना पड़े झूठ चाहे 

बुद्दू बनाने की कोशिश
करता है पढ़े-लिखों को भी
अनपढ़ की तो बात छोड़ो
बोलता है जैसे ही कुछ पैसे बचे
छूटे नहीं है ये टॉफी ले लो


Tuesday, 24 January 2023

सत्ता की भूख

बड़ी ख़तरनाक ये भूख है
एक बार जो पुरी हो गई
बढ़ती जाती है फिर
होती रहती फिर चूक है

पहले समय के
राजा-महाराजा इसके सबूत है
अपनी सत्ता बढ़ाने के चक्कर में
खुद तो डूब गए
देश को भी गुलाम करा गए
हम उन्हीं की गलतियों को
आजतक है झेल रहे 

आज भी दिख रहा
हर तरफ वैसा ही दुःख है
उन्हें देश और जनता की
कोई भी चिन्ता नहीं
दिखती केवल सत्ता की भूख है

अपनी सत्ता का स्वार्थ-लालच
कर देता उन्हें मुक है
हो जाए कहीं दंगे-अहिंसा
वो कुछ भी बोलेंगे नहीं
बात को टाल कर चुप है

जनता फसी रहे सामाजिक
परेशानियों - कुरीतियों में
यही उनका सुख है
अरे जनता क्या सवाल पूछेगी उनसे
उनके जीवन में तो अभी कई दुःख है



Saturday, 21 January 2023

आरोपी

उसको सब पता है
उसकी क्या खता है
चार दिन का कारावास
न मिलनी है मौत की सजा
तभी तो हो रही उसकी मनमर्जी
यही उसकी निडरता की है वजा

एक आदमी दस को
मार के चला जाता है
इंसाफ आँख बंद कर
देखता ही रह जाता है
आती है जब-जब भी
उसकी मौत की बारी
तब मानव अधिकार के
नियम का उलंगन हो जाता हैहै

कब तक चलता रहेगा ऐसा
किसी की ज़िन्दगी ही चली जाए
उसके लिए वो एक तमाशा है
कानून के हर दाव-पेच
हर धारा उसको पता है
क्या कभी बदलनी ये परिभाषा है

कैसे कम होंगी वारदातें
वो तो पैसों के लिए
कुछ भी करने को तैयार है
बढ़ती जा रही है उसकी चाहते
कैसे मिलेगी उसे सजा
कौन ढूंढेगा उसके लिए वजा
जो करते है सजा की बातें
वही लोग है उसको बचाते



Wednesday, 18 January 2023

मज़बूरी का फ़ायदा

मान गया वो कैसे
काम करेगा ऐसे-ऐसे
देंगे उसे आधे पैसे
कोई न समझ पाया बात
क्यों उसकी सबसे दूरी थी
उसकी तो मज़बूरी थी

मिल जाए जो कुछ
वही बहुत उसके लिए
कितना कमाओगे उससे
मालूम है उसे पर बोल न पाया
क्यों उसकी सबसे दूरी थी
उसकी तो मज़बूरी थी

काम से काम किया उसने ज्यादा
न की कभी कोई चलाकी
न तोड़ा कभी अपना वादा
जितना काम बोला वो किया
फिर भी उसकी सबसे दूरी थी
न उसकी कोई हजूरी थी

अरे पैसों के लालची
न कर तू कोई ऐसा गुनाह
कि मिलनी मुश्किल हो जाए माफ़ी 
तूने तो उसको भी नहीं छोड़ा
जिसकी दिख रही मज़बूरी थी



Sunday, 15 January 2023

काला पानी

ढल रही थी जहाँ जवानी
बन रही थी वहाँ एक कहानी
दो वक़्त की रोटी का पता नहीं
मुश्किल से मिलता था पानी

रहते थे वहाँ आज़ादी के परवाने
जिन पे चढ़ी थी आज़ादी की मस्तानी
हर पल आज़ादी पाने का जूनून
इन्कलाब के गीत बोलती उनकी जुबानी

अलग-अलग रखा जाता सबको
विद्रोह की आवाज़ होती दबानी
फिर भी नहीं डरते थे वो
न दिखती चेहरे में कोई परेशानी

किसी को उड़ाया तोप से
किसी की फांसी से रवानी
न पैदा कर सके फिर भी दहशत
न ठण्डा कर पाए उबलता लाल पानी

मिटा के भी न मिटा सके
रह गई इतिहास के पन्‍नो में निशानी
भूल गए थे वो विदेशी
माँ थी वो हमारी काला पानी


Thursday, 12 January 2023

मन के सच्चे

बच्चे होते हैं
मन के सच्चे
न किसी से छुपाने का डर
न किसी से बताने का डर

साथी चाहिए उनको
कोई साथ खेलने के लिए
न उन्हें धर्म की परवाह
न उन्हें जाति का डर

निस्वार्थ भाव से
मिलते हैं वो सभी से
चल पड़ते हैं किसी के साथ भी
चॉकलेट या टॉफी के लालच से

कोई उन्हें हँसाए या रुलाए
नहीं नफरत उनके मन में
कौन अपना कौन पराया
नहीं रहते वो इस चिन्ता में

आज़ाद पंछी हैं वो
चले जाते हैं किसी के भी घर में
इधर-उधर चलना तोड़-फोड़ करना जारी
जैसे हो अपने ही घर में



Monday, 9 January 2023

भूल गए कानून

पैसे वालों के आगे
आदमी की तो क्या हिम्मत
उनके सामने न बोल पता है कानून

चले जाते हैं वो करके गुंडागर्दी
देखती रह जाती है जनता
आँख बंद कर देता है कानून

किसी को भी रास्ते से
किसी को दुनिया से उठाते हैं
फिर भी कुछ नहीं कर पता है कानून

वो तो रहते हैं आराम से
दहशत में रहती है जनता
उलझा रहता है कानून

खेल-खेल में कर देते हैं खून
न कोई सबूत न कोई ग्वाह
बस ढूंढ़ता रह जाता है कानून

क्यों थम गया है जूनून
क्या भूल गए है अपना काम
क्यों बदनाम हो रहा है कानून

कब बदलेगा ये रवैइया
गरीबो पर दहशत
पैसे वालों से दहशत में कानून




Thursday, 5 January 2023

पतन की ओर

चमक-दमक है सब कुछ
एक आधुनिकवादी के लिए
भागना है दिन-रात
क्या जी रहा है इसीलिए

उसे न खुद की चिंता है
न है प्रकृति की
उसे ही मिल जाए सब कुछ
चाहे बचे न बचे आनेवालों के लिए

रहना ही है जब
चार दिवारी के भीतर
फिर इतना बड़ा ताम-जाम
ये सब है किसके लिए

गुज़ारा जब दो
रोटी से चल सकता है
फिर ज्यादा से ज्यादा खाना
बनता है किसके लिए

आगे निकलने की वजह ढूँढता है
कभी तो सोच कारण रुकने के लिए
वैसे भी जितना तू भागेगा
हानिकारक होगा प्रकृति के लिए

तुम्हारा ये दिखावे का जुनून
अभिषाप बन जाएगा मानव के लिए
आने वालें कहेंगे हमारे पुर्वज
खुद तो आसमान में रहते थे
हमें धरती भी न छोड़ी जीने के लिए